14 January, 2013

भ्रष्ट का बचाव भ्रष्टाचार को बढ़ावा


नेहरु इंदिरा के स्याह सच के गवाह की किताब का खुलासा

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के दौरान तमाम बहसों में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का वह मशहूर कथन दुहराया जाता रहा कि भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका कर फांसी दे देनी चाहिए. लेकिन घोटाले तो नेहरु के प्रधानमंत्रीत्व काल में भी हुए थे. क्या किसी को मामूली सजा भी हुई? जीप घोटाले और हरिदास मुंद्रा एलआईसी बीमा घोटाले में फंसे मंत्रियों के प्रति नेहरु का व्यवहार कैसा रहा? एम ओ मथाई जैसे भ्रष्ट अधिकारी और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जैसे भ्रष्टाचारी योगगुरु उनके परिवार के करीबी थे, उनके साथ उनका रवैया कैसा रहा? 

डा. जनक राज जय अपनी किताब स्ट्रोक्स ऑन ला एंड डेमोक्रेसी इन इंडिया: एन आई विटनेस में जब इन सवालों से पर्दा हटाते हैं तब यह बात और पुख्ता ढंग से साबित होती है कि सरकार में प्रधानमंत्री के निजी तौर पर ईमानदार होने का कोई खास मतलब नहीं होता, केवल इतने भर से कोई सरकार बेदाग़ नहीं रह सकती. इस किताब से एक बात यह भी साफ़ होती है कि अगर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू से ही कठोर रवैया अपनाया होता तो यह विषबेल आज विकराल बरगद जैसी नहीं बनी होती. उनके भावुक और नरम रवैये से उस समय न केवल भ्रष्टाचारियों को राहत मिली, बल्कि उनकी लाडली बेटी इंदिरा, जो कि बाद में देश की शक्तिशाली प्रधानमंत्री बनी, को भी गलत करने या गलत लोगों से घिरे रहने की शह मिली. जिसका खामियाजा यह हुआ कि कांग्रेस तो दिन ब दिन भ्रष्ट राजनीतिक पार्टी होती ही गई, साथ में पूरी राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र भ्रष्ट से भ्रष्टतम होता गया. उन्होंने हाल ही में छपी अपनी किताब में विस्तार से यह भी बताया है कि आपातकाल के दौरान न्यायपालिका किस हद तक विवश थी. देश के दो प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके डॉ. जनक ने उनके व्यक्तित्व और उनकी ईमानदारी को करीब से जैसा देखा, वैसा लिखा है. पेश है कुछ खास अंश:

निजी तौर पर ईमानदार नेहरु


छोटी कार से संतुष्ट 

प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरु को एक बड़ी कार मिली. उन्हें उसमें सवारी करने में संकोच हुआ. उन्होंने अपने प्रधान निजी सचिव के. राम को बुला कर कहा कि इस बड़ी कार को तुरत राष्ट्रपति भवन भेज दिया जाए और उनके लिए छोटी कार अम्बेसडर का इंतजाम किया जाए. के. राम ने उस कार को राष्ट्रपति भवन भेजने के बदले खुद इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. किसी तरह नेहरु जी तक यह बात पहुंची. उन्होंने के. राम को बुला कर कार के बारे में पूछा. भौंचक के. राम ने बस इतना कहा कि सर, उसे मैं इस्तेमाल कर रहा हूँ. नेहरु जी फ़ौरन फट पड़े, यह क्या बदतमीजी है, जल्दी से कार को राष्ट्रपति भवन भेज कर मुझे रिपोर्ट करो.

बचत और एयर कंडीशनर

प्रधानमंत्री के कमरे में दो एयर कंडीशनर लगे थे. जवाहरलाल नेहरु ने के. राम को बुलाया और कहा कि ‘एक ठंडी मशीन मेरे कमरे से हटा दो और इसको मेरे आने से आधा घंटे पहले चालू किया करो’. के. राम ने कहे मुताबिक एक एयर कंडीशनर को वहां से हटवा लिया और अपने कमरे में लगवा लिया. नेहरु जी को जब यह बात मालूम हुई, उन्होंने के. राम को बुलाकर कहा कि मैंने एयर कंडीशनर अपने कमरे से बचत के लिए हटवाया था, इसलिए नहीं कि तुम अपने कमरे में लगवा लो.


अपनों से लाचार नेहरु

एम ओ मथाई की ढिठाई 

अपने विशेष सहायक एम. ओ. मथाई पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को बहुत ज्यादा विश्वास था. प्रधानमंत्री सचिवालय में सबसे ताकतवर व्यक्ति वही था. नेहरु जी पर लिखी अपनी किताब में डा गोपाल ने तो यह भी लिखा है कि वह नेहरु के कार्यालय में अमेरिका का आदमी था. प्रधानमंत्री के निजी सचिव आईसीएस के. राम भी सारी फाइलें मथाई के जरिये ही नेहरु जी तक भेजते थे. मेरी नजर में नेहरु ने सबसे बड़ी गलती यह कि कि उन्होंने इस व्यक्ति को प्रधानमंत्री आवास में रहने दिया. वह अविवाहित था और प्रधानमंत्री आवास में भी शराब पीने से नहीं हिचकिचाता था. मौलाना अबुल कलाम आजाद और गोविन्द वल्लभ पन्त जैसे ही कुछ मंत्री प्रधानमंत्री से सीधे मिल सकते थे, नहीं तो औरों को मथाई के जरिये उनसे मिलना होता था. प्रधानमंत्री आवास में रहने की वजह से मथाई ने इंदिरा से भी नजदीकी बढ़ा ली थी. इंदिरा गांधी वहीं रहती थीं, जबकि उनके पति फिरोज गाँधी तब फिरोजशाह रोड पर कहीं रहते थे. जब इंदिरा गाँधी और फिरोज गाँधी के बीच कुछ दूरियां बढ़ीं, तब नेहरु जी ने एक और बड़ी गलती की कि उन्होंने मथाई को उनके बीच सुलह कराने की जिम्मेदारी दी. क्योंकि वह दोनों के बीच सुलह तो चाहता ही नहीं था, उलटे उनके बीच दूरियां बढ़ाने का काम कर रहा था.

एम ओ मथाई अपने आप को दूसरा प्रधानमंत्री समझने लगा था और अपनी हरकतों से उसने प्रधानमंत्री नेहरु को कई तरह से शर्मिन्दगी में डाला. उसने अपनी माँ के नाम पर बनाये अछमा ट्रस्ट के लिए बहुत बड़ी रकम जुटाई. इसकी एक ट्रस्टी तब की स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर थीं जो मथाई की काफी करीबी मानी जाती थीं. संसद में सवाल उठा, जिसमें मथाई पर यह दोषारोपण किया गया कि उसने अपनी स्थिति का फायदा उठा कर भ्रष्ट तरीके से ट्रस्ट के लिए पैसे इकट्ठे किये हैं. इसके बावजूद नेहरु अपनी तरफ से उससे इस्तीफा नहीं मांग सके. हालाँकि कई रोज के हल्लेगुल्ले के बाद अंतत: उसे जाना पड़ा, और जब उसने प्रधानमंत्री को अपने इस्तीफा देने के बारे में बताया तब उन्होंने कहा कि तुमने यह सही काम किया.

जांच समिति के अध्यक्ष ए. के. चंदा ने जब मथाई से कहा कि वह यह बताये कि प्रधानमंत्री से जुड़ने से पहले उसके पास कितने पैसे थे, तब वह साफ़ साफ़ कुछ नहीं बता सका. लेकिन नेहरु जी ने कहा कि मुझे कुछ कुछ याद है कि मथाई के पास लगभग इतनी जमा राशि थी. तब वितमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने नोट में लिखा कि अगर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि उन्हें याद है कि मथाई के पास कितना पैसा था तो उन पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं है. इस तरह से नेहरु जी ने मथाई को बचाने का भरसक प्रयास भी किया. फिर भी बाद में उसने उन पर और इंदिरा पर कीचड़ उछालते हुए दो किताबें लिखीं.

टीटी कृष्णमाचारी को नेहरु की विदाई

मुंद्रा घोटाले में तत्कालीन वितमंत्री टीटी कृष्णमचारी का नाम आया. एकसदस्यीय जस्टिस छागला कमिटी जांच कर रही थी. उसी दौरान नेहरु जी मुंबई में अपने एक भाषण में उनकी तारीफ कर आये. जस्टिस एम. सी. छागला नाराज हुए और आपत्ति जताई कि जब मैं घोटाले में टीटी कृष्णमाचारी की संलिप्तता की जांच कर रहा हूँ तब प्रधानमंत्री द्वारा उनकी सार्वजनिक तारीफ करने का क्या मतलब है. नेहरु ने अपने इस किये पर अफ़सोस जताया. लेकिन उन्होंने कृष्णमाचारी को बचाने के लिए सभी उपाय भी किये. एमसी छागला की जांच के बाद जब कृष्णमाचारी को मंत्री पद छोड़ कर जाना ही पड़ा, तब वे उनको विदा करने खुद एअरपोर्ट गए. निजी संबंधों का उनका यह भावुक प्रदर्शन भ्रष्टाचारियों को भयभीत करने वाला तो नहीं ही था.
 
स्वामी के हित में इंदिरा का हठयोग

स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी नेहरु परिवार से कैसे जुड़े, यह मुझे नहीं मालूम. लेकिन वे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के लिए शर्मिन्दगी और परिवार की प्रतिष्ठा के लिए घातक जरुर साबित हुए. वे प्रधानमंत्री निवास पर अक्सर आने वालों में से थे. बाद में उन्होंने इंदिरा गाँधी को योग सिखाना शुरू किया. उन्हें इंदिरा जी से मिलने के लिए पहले से समय तय नहीं करना होता था. उन्होंने इंदिरा जी से कई तरह के फायदे भी उठाये. तत्कालीन केन्द्रीय आवास मंत्री मेहरचंद खन्ना ने सरकारी बंगले से जब स्वामी को निकाल दिया तब इंदिरा जी ने उन्हें पत्र लिखा कि स्वामी को सरकारी बंगले से न निकाला जाए. मुझे याद है कि मेहरचंद खन्ना ने इंदिरा गाँधी को वापस पत्र लिखा कि यह मामला आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है और अगर आप फिर भी हर हाल में स्वामी की मदद करना चाहती हैं तो अपने पिता जवाहरलाल से कहिये कि वे मुझे इस बात के लिए लिखें.

डा. के.एल. श्रीमाली तब शिक्षा मंत्री थे और स्वामी अपनी किसी परियोजना के लिए एक और साल का अनुदान चाहते थे. डा. श्रीमाली ने उनसे कहा कि वे पिछले साल के अनुदान की ऑडिट रिपोर्ट जमा कराएं. लेकिन स्वामी ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने इंदिरा गाँधी से जाकर कहा कि शिक्षा मंत्री ने इस साल के लिए उन्हें अनुदान देने से मना कर दिया है. इस पर इंदिरा गाँधी ने डा. श्रीमाली को लिखा कि वे स्वामी को अनुदान दें. डा श्रीमाली ने इंदिरा गाँधी को जवाब में लिखा कि बेहतर हो कि आप स्वामी को पिछले साल के अनुदान की ऑडिट रिपोर्ट जमा कराने की सलाह दें. इसके बगैर उन्हें अगला अनुदान नहीं मिल सकता. इंदिरा गाँधी ने इसको अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया और अपने ‘पापू’ नेहरु जी से उनकी शिकायत की. इस पर नेहरु जी ने भी ऑडिट रिपोर्ट जमा कराने की ही बात कही. लेकिन इंदिरा जी उनके पीछे पड़ी रहीं कि बगैर किसी ऑडिट रिपोर्ट के स्वामी को अनुदान मिल जाए. नेहरु जी थोड़े खीजे भी, बल्कि एक रोज यह भी कहा कि ‘क्या मैं उसको (डा श्रीमाली को) खिड़की से बाहर फेंक दूं?’

लेकिन इंदिरा तो जैसे स्वामी की मदद के लिए पागल थीं. उन्होंने आखिरकार डा श्रीमाली को शिक्षा मंत्रालय से हटवा कर ही दम लिया. और डा श्रीमाली के बाद जब एम. सी. छागला ने शिक्षा मंत्रालय का जिम्मा संभाला तो इंदिरा गाँधी ने उनको अनुरोध कर के तीन चार दिन के लिए प्रधानमंत्री आवास में ही रखा. उनके कपडे भी वहीं सिलवाए. और उसी दौरान शिक्षा सचिव मि. कृपाल से स्वामी की फ़ाइल घर पर मंगवा कर उस पर नए शिक्षा मंत्री के दस्तखत करवा कर ही दम लिया. इस तरह की चालबाजी को देखना मेरे लिए तब असह्य था.

लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब इंदिरा गाँधी स्वामी से छुटकारा चाहने लगीं, वह उनके लिए अक्सर शर्मिन्दगी का कारण बनने लगा था. और आखिर उन्होंने एक दिन मुझे एक नोट भेजा, स्वामी को रफा दफा करने के लिए. मैंने वह नोट यशपाल कपूर को दिखाया. उसका स्वामी के प्रति झुकाव था. उसने मुझे कुछ भी ऐसा करने से मना कर दिया. बाद में उसने दक्षिण दिल्ली में स्वामी के रहने का इंतजाम किया. इंदिरा गाँधी की मर्जी के खिलाफ यह सब होना मुझे सही नहीं लगा. लेकिन यशपाल कपूर मेरा सहकर्मी और करीबी मित्र था, इसलिए मैं चुप ही रहा. मैंने कपूर से कहा कि वह गलत कर रहा है, लेकिन स्वामी को बचने में उसका निजी स्वार्थ था. स्वामी के यहाँ उसकी शामें अच्छी कटती थीं. बाद में स्वामी फिर से नेहरु परिवार के करीब आया संजय गाँधी से जुड कर. मुझे तो यही लगता है कि अगर यशपाल कपूर ने तब स्वामी को नहीं बचाया होता तो वह उसी समय समाप्त हो जाता और शायद संजय गाँधी को मृत्यु के क्रूर पंजे से बचाया जा सकता था.

जब धवन ने दी मुझे कमीज-पैंट

चीन के साथ हुए युद्ध के बाद प्रधानमंत्री नेहरु की पहल पर केंद्र सरकार की तरफ से सिटिजन’स सेन्ट्रल काउन्सिल का गठन हुआ, जिसकी चेयरमैन श्रीमती इंदिरा गाँधी बनाई गईं. यह कैबिनेट मंत्री के दरजे का ओहदा था. इस काउन्सिल के जेनेरल सेक्रेटरी राजा दिनेश सिंह और द्वारका प्रसाद मिश्र बनाए गए. राष्ट्रपति भवन के कुछ कमरों में इस काउन्सिल का कार्यालय शुरू हुआ. इंदिरा जी के सहायक के बतौर मुझे नियुक्त किया गया. इंदिरा जी एक और संस्था की चेयरमैन थीं और वहां की जिम्मेदारियों के लिए उषा भगत इंदिरा जी की निजी सचिव थीं. आर. के. धवन तब उषा भगत से संबद्ध थे और इंदिरा जी के विश्वासपात्र थे. काउन्सिल देशवासियों से सेना और सेना के परिवारजनों की मदद के लिए सहायता  सामग्री जुटा रही थी. लोग कपड़े, रुपये, खाने के सामान तो भेज ही रहे थे, सोने के जेवरात तक सैनिकों की सहायता के लिए दे रहे थे. स्टोर रूम प्रधानमंत्री आवास में बनाया गया था. स्टेट बैंक ने वहीं अपनी एक शाखा भी खोल दी थी, जिसमें एक लॉकर का इंतजाम था.

पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों पंजाब से एक रात ढेर सारा सोना लेकर प्रधानमंत्री आवास में बने लॉकर में जमा कराने आ गए. नेहरु जी ने उनसे पूछा कि इतने सोने की कोई फेहरिश्त है, प्रताप सिंह कैरों चुप. उनके साथ कोई मि. कपूर नाम का स्टाफ आया था. उसने एक नकली फेहरिश्त तैयार की और मुझसे कहा कि इस पर दस्तखत कर दो. मैंने मना कर दिया, लेकिन धवन ने तुरत दस्तखत कर दिए.

व्यवस्था तो बहुत सूझबूझ के साथ बनी थी, लेकिन यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था कि लोगों ने सैनिकों और उनके परिवारजनों के लिए जो सामान सहायता कोष में भेजा था, उनमें से कुछ गायब कर दी गईं. कोशिश करने पर भी मुझे इस बारे में मालूम नहीं चल पा रहा था कि इसके पीछ कौन है. एक रोज मैं प्रधानमंत्री के निजी सचिव के. राम के कमरे में बैठा था कि आर के धवन आया और उसने छः कमीज और पैंट मुझे देकर घर ले जाने के लिए कहा. उसे झिडकते हुए मैंने कहा कि इन्हें स्टोर में वापस रख दो. तब मैंने बात को कुछ कुछ समझा.

लेह में जवानों के लिए सामान से भरा हवाई जहाज जब उतरा तो उसमें से सिर्फ कूड़ा कचरा निकला. इस बात को मैंने इंदिरा गाँधी के सामने रखा. उन्होंने धवन से पूछा. धवन के पास कोई जवाब नहीं था. इससे पहले भी मैं ऐसी बातें उनके ध्यान में लाता रहा था, जिसके जवाब में वे यही कहती थीं कि उन्हें  सब कुछ पता है और ऐसे नोट मैं उन्हें न लिखा करूँ. अंत में मैंने उनको कहा कि मुझे स्टोर के निरिक्षण काम से मुक्ति दे दें.

भ्रष्टाचार पर निर्णायक भूमिका नहीं निभा सके नेहरु

चीनी हमले के बाद कृष्ण मेनन को सभी ने हार के लिए जिम्मेदार ठहराया. लेकिन प्रधानमंत्री नेहरु उनसे इस्तीफा नहीं मांग पाए. हालाँकि चारों तरफ से दबाव बनने पर मेनन को किसी तरह जाना ही पड़ा. फिर भी जवाहर लाल नेहरु की नरमी ने गलत सन्देश दिया.

मुंद्रा घोटाले में तत्कालीन वितमंत्री टीटी कृष्णमचारी का नाम आने के बाद उनसे प्रधानमंत्री नेहरु ने  इस्तीफा नहीं माँगा, बल्कि उनकी सार्वजनिक तारीफ की और आरोप साबित होने पर जब कृष्णमाचारी मंत्री पद छोड़ कर दिल्ली से अपने गृहराज्य जा रहे थे, तब उनको विदा करने खुद एअरपोर्ट गए. निजी संबंधों का उनका यह भावुक प्रदर्शन भ्रष्टाचारियों को भयभीत करने वाला तो नहीं ही था.

अपनी बेटी के कहने पर प्रधानमंत्री नेहरु ने ईमानदार और कर्मठ व्यक्ति डा. के. एल. श्रीमाली को शिक्षा मंत्री के पद से हटाया और इस तरह धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के लिए गलत तरीके से अनुदान स्वीकृति का रास्ता साफ़ किया.


आखिर कौन हैं डॉ. जनक राज जय?

फोटो सौजन्य: दिल्ली प्रेस 
81वर्षीय डॉ. जनक राज जय ने अपने कैरियर की शुरुआत 1956 में प्रधानमंत्री कार्यालय में बतौर उनके निजी स्टाफ शुरू किया था. भारत चीन युद्ध के दौरान युद्धरत भारतीय सैनिकों और उनके परिवार को मदद पहुँचाने के उद्देश्य से जब भारत सरकार ने सिटिजन’स सेन्ट्रल काउन्सिल का गठन किया, तब डा जनक काउन्सिल की चेयरमैन श्रीमती इंदिरा गाँधी के निजी सहायक बनाये गए. उसके बाद वे उनके साथ ही जुड़े रहे और 1969 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर वकालत के पेशे में चले गए. लेकिन तब भी उनका गाँधी परिवार और कॉंग्रेस से संबंध खत्म नहीं हुआ. आपातकाल लागू होने की घोषणा के बाद जब डा जनक राज जय ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को एक पत्र लिख कर उनके इस कदम की आलोचना की और इसके नतीजों को सामने रखा तब इंदिरा गाँधी ने फ़ौरन उनको गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया. पूरे आपातकाल के दौरान तिहाड जेल में बंद रहे डा जनक के पास जेल में बंद राजनीतिक कैदियों की गतिविधियों की खबर सरकार को देने का प्रस्ताव भी भिजवाया गया था, जिसके एवज में उनको वहाँ तमाम सहूलियतें देने और उनके परिवार की सुरक्षा का वादा किया गया था. लेकिन डा जनक इस समझौते के लिए राजी न हुए. तीस से ज्यादा किताबों के लेखक डा जनक भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के भी सहयोगी बने, जब कांग्रेस से निकाले जाने के बाद उन्होंने जनमोर्चा नाम से अलग पार्टी का गठन किया. फिलहाल इंडियन ला इंस्टीट्यूट की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य हैं. 

('सरिता' के लिए अगस्त, 2012 में हुई बातचीत के आधार पर तैयार)

11 January, 2013

पता नहीं किसको मिलते हैं ये पुरस्कार: कुसुम अंसल

कुसुमांजलि फाउन्डेशन ने हर साल दो कृतियों को ‘कुसुमांजलि साहित्य सम्मान’ देने की शुरुआत की है. दो में से एक कृति का चुनाव हिंदी भाषा से हुआ करेगा और दूसरे का किसी अन्य भारतीय भाषा से. फाउन्डेशन सम्मानस्वरूप ढाई ढाई लाख रूपये की राशि दे रहा है. वर्ष 2012 के लिए हिंदी से उषाकिरण खान के उपन्यास ‘सिरजनहार’ को और तमिल से के. विट्टल के साहित्यिक संस्मरण ‘वाजविन सिला उन्नाडंगल’ को  सम्मान के लिए चुना गया था. कुसुमांजलि फाउन्डेशन अंसल ए.पी.आई. द्वारा समर्थित है और ‘कुसुमांजलि साहित्य सम्मान’ अंसल ए.पी.आई. की डाइरेक्टर और कुसुमांजलि फाउन्डेशन की अध्यक्ष डा. कुसुम अंसल की महत्वाकांक्षी योजना है. डा कुसुम अंसल हिंदी की प्रतिष्ठित लेखिका हैं. कविता, कहानी, आत्मकथा, पटकथा लेखन, धारावाहिक लेखन जैसी विधाओं में सिद्धहस्त कुसुम जी अपने कथा साहित्य के कारण ज्यादा जानी जाती हैं. उनके उपन्यास ‘एक और पंचवटी’ पर बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में  1985 में फिल्म बन चुकी है. एक और उपन्यास ‘रेखाकृति’ की भी नाट्य प्रस्तुति हुई है. कई पुरस्कारों से सम्मानित डा कुसुम के लेखकीय जीवन का सफर बहुत आसान नहीं रहा है. फिर भी उन्होंने परिवार की देखभाल और अपने लेखन के बीच हमेशा संतुलन कायम रखा है. दिल्ली प्रेस के अपने कार्यकाल में 'गृहशोभा' पत्रिका के लिए  उनके लेखकीय जीवन और सम्मान योजना के बारे में उनसे  मेरी लम्बी बातचीत  हुई थी, जिसका  कुछ अंश वहां प्रकाशित हुआ था. साभार पूरी बातचीत यहाँ  दे रहा हूँ: 


आपका जन्म अलीगढ के जिस समृद्ध परिवार में हुआ, वहाँ कानून की पढ़ाई का चलन था. आपने मनोविज्ञान जैसे विषय में एम. ए. की पढाई की, और साहित्य रचना के क्षेत्र में सक्रिय हो गईं. लेखन की तरफ रुझान कैसे हुआ?
अलीगढ में उस जमाने में, अभी तो बदल गया है, बहुत सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे और वहाँ की एक अलग सी संस्कृति थी. मेरे घर में एजुकेशन को बहुत महत्व दिया जाता था. दादा लन्दन से बैरिस्टरी की पढ़ाई करके आये थे, पिताजी ने इलाहाबाद से वकालत की पढ़ाई की थी. मेरे पिता को साहित्य और संगीत से बहुत लगाव था. हमारे घर में बहुत सी पत्रिकाएं आती थीं और बहुत बड़ा पुस्तकालय था. अलीगढ तब बहुत छोटा सा शहर था, चार-छः लोग ही बड़े हुआ करते थे उस समय वहाँ. उसमें मेरे पिता का खास स्थान था. शहर में या अलीगढ यूनिवर्सिटी में जितने भी बड़े साहित्यकार उस वक्त आया करते थे, सब मेरे घर में ठहरते थे. क्योंकि उस जमाने में अलीगढ में होटल नहीं थे. मेरे पिता हर साल चार दिन की एक नुमाइश आयोजित करते थे, जिसमें कवि सम्मलेन होता था,  मुशायरा  होता था, और दो दिन संगीत और नाटक होते थे. जितने संगीतकार और कवि होते थे, वे सब एक दिन हमारे घर में भी परफार्म करते थे. मैने बच्चन जी की ‘मधुशाला’, भवानी प्रसाद मिश्र की ‘मैं गीत बेचता हूँ’ और पन्त जी की कविताएं, साथ में तलत महमूद की गजलें अपने ड्राइंग रूम में सुनीं. इस्मत चुगतई तो अलीगढ की ही थीं. उनका हमारे घर में आनाजाना था. उस समय मुझे नहीं मालूम था कि आगे जाकर ये बड़ी साहित्यकार बनेंगी. मुझे लगाव था इन सब लोगों से. तो उनको देख कर मैं थोड़ा बहुत लिखती थी. कालेज और यूनिवर्सिटी की पत्रिकाओं में मेरी कहानियाँ छपीं. कुछ कविताएं भी लिखीं तब, उसी ज़माने में मैने दो उपन्यास लिखे थे जो बाद में छपे.

कालेज के दिनों का लिखा पहला उपन्यास कौन सा है आपका?
मैने जो नाम दिया था उसे, वह अब याद भी नहीं. छपते समय उसका नाम बदल कर ‘उदास आँखें’ हो गया. यह आई ट्रांसप्लांट पर आधारित उपन्यास है. जब लिखा था, तब यह बड़ा और अच्छा इश्यू था. बाद में इस विषय पर एक फिल्म भी बनी. वो मेरे उपन्यास पर आधारित नहीं थी. एक दूसरा उपन्यास था ‘नींव का पत्थर’. वो भी लिखा कालेज के जमाने में ही, लेकिन छपवाया बाद में. तब अपने लिखने को कभी भी मैंने सीरियसली लिया नहीं.

लिखने की इस लत की वजह से ही क्या आपने मनोविज्ञान में एम.ए. करने के बावजूद हिंदी साहित्य में पी-एच. डी. किया?
नहीं, पी-एच.डी. तो मैंने बाद में किया. 1987 में, पंजाब यूनिवर्सिटी से, अपनी बेटी की शादी के बाद. एम.ए. 1961 में किया था, अलीगढ यूनिवर्सिटी से. बीच में पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से एक लंबा फासला रहा.

तो क्या लिखने की निरंतरता शादी के बाद भी कायम रही थी?
नहीं. 1962 में मेरी शादी हुई. शादी के बाद तीन बच्चे हो गए दस साल के अंदर. (हँसते हुए)  तीन तीन बच्चों की बहुत जिम्मेदारियां होती हैं. हमलोग सेल्फमेड आदमी हैं. तब इतनी आर्थिक सुविधाएं नहीं थीं. घर का बहुत सारा काम करना पड़ता था. बच्चों को संभालना पड़ता था, बच्चों को पालना इतना आसान नहीं था. तो 12-14 साल तक तो कुछ नहीं किया, सिवाय इसके कि अपने बच्चों को बड़ा किया. 

पत्नी और माँ की भूमिका में सिमट चुकी लेखिका ने फिर से खुद को हासिल कैसे किया?
एक अच्छी सी घटना हुई, जब बच्चे छोटे थे मेरे. मेरी मित्र अलीगढ की थीं, आती रहती थीं वो. उन्होंने  कहा कि तुम अपनी जिंदगी क्या खराब कर रही हो, बच्चे पाल रही हो बस. तुम्हें कुछ और भी करना चाहिए. चलो, एक नाटक हो रहा है, हमलोग नाटक में काम करते हैं. मैंने कहा कि अरे, मुझे कौन लेगा प्ले में? मैं ३ बच्चों की माँ हूँ, पेट इतना बढ़ा हुआ है. लेकिन उस दिन इप्टा में गए हमलोग. वहाँ उन्होंने मुझे ऐसे लिया जैसे मैं उनकी पुरानी मेंबर हूँ. एक तो मुझे उनका एटीट्यूड बहुत ही अच्छा लगा और उसके अलावा वहाँ का वातावरण इतना अच्छा था कि मुझे लगा कि मैं तो इस वातावरण का हिस्सा हूँ. मैं जहाँ रहती हूँ वो मेरा जीवन नहीं है. मैं यह बात बहुत दुहराती हूँ कि मुझे लगता था कि मेरा जीवन वो है और जहाँ रहती हूँ वो नाटक है. वहां हमलोगों ने एक साल तक ग़ालिब की २-३ सीरीज की. ग़ालिब मेरे बहुत प्रिय शायर थे और मैंने ‘ग़ालिब के उड़ते पुर्जे’ नाटक में अभिनय किया. अजीत कुरैशी उसके निर्देशक थे, अभी हाल ही में उन्होंने हम सभी पुराने कलाकारों को बुलाकर सम्मानित किया था. वहाँ दिन रात काम करते हुए मुझे लगा कि वहाँ कोई शायर था तो कोई पत्रकार और कोई नाटककार. उनके साथ एक साल उठना बैठना हुआ तो किसी ने पूछा कि आप लिखती थीं तो छपवाया क्यों नहीं? तब मुझे लगा कि मैंने कभी इस बात पर सोचा ही नहीं. फिर मैंने विचार किया और अपने सारे पुराने कागज़ निकाले. ‘उदास आँखें’ उपन्यास का पुनर्लेखन किया, वह छपा, फिर ‘नींव का पत्थर’ भी छपा. उसके बाद मैंने नया उपन्यास ‘एक और पंचवटी’ लिखा.

तो 1974 के बाद जो आपका लेखकीय जीवन फिर शुरू हुआ, उसमें लिखा गया पहला उपन्यास ‘एक और पंचवटी’ था. यह तो आपका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास भी है?
हाँ, सही है. एक और बात है. पहले जो दोनों उपन्यास छपे, वो पॉकेट एडिशन में थे. तब मुझे पता नहीं था कि पॉकेट एडिशन को साहित्यिक नहीं माना जाता. लेकिन ‘एक और पंचवटी’ हार्ड बाउंड में छपा 76-77 में. यह लोगों को इतना पसंद आया कि कई भाषाओं में अनूदित हो गया. बासु भट्टाचार्य ने इस पर फिल्म भी बनाई, मैंने उसमें स्क्रिप्ट भी लिखा.

चूँकि शादी से पहले पढ़ने लिखने, साहित्य-संस्कृति की दुनिया में आपकी सक्रिय भागीदारी थी, ऐसे में 13 साल तक बिलकुल उससे आप कटी रही, आपका क्या अनुभव रहा?
उस दौरान की मेरी घुटन मेरी बहुत सारी कहानियों में आई है. अभी हाल ही में मैं अपनी पुरानी कहानियों को देख रही थी. दोबारा पढ़ते हुए ध्यान गया कि उनमें से कई कहानियों में आया है कि घर के काम इतने होते थे कि कविता-कहानी की अपनी किताबों को आलमारी में बंद रखना पड़ता था, क्योंकि पढ़ने का समय ही नहीं था. जैसा कि मैंने बताया ही, मेरे शुरूआती वैवाहिक जीवन में आर्थिक अभाव भी बहुत था. काम बहुत करना होता था, इसलिए थक कर सो जाती थी. जब मैंने नए सिरे से लगातार लिखना शुरू किया तो लगा कि इतने दिनों से मुझे साहित्य के बारे में कुछ पता नहीं है. फिर एक दिन मैं किताबों की एक दूकान में गई और वहां से शिवानी का उपन्यास ‘कृष्णकली’ खरीद कर ले आई. पढ़ा. तब शिवानी को पहली बार पढ़ा था. मुझे वह उपन्यास इतना पसंद आया कि लगा, पता नहीं मैं कौन सी दुनिया में रह रही हूँ. लोग इतना सुन्दर लिख रहे हैं और मैंने पढ़ा ही नहीं. फिर मैंने उनकी सारी किताबें मंगा कर पढ़ीं. हिंदी पाठकों के साथ एक असुविधा तो यह भी है न कि हिंदी की किताबें मिलती नहीं हैं आसानी से. खैर, ‘एक और पंचवटी’ के बाद तो मैंने मुडकर देखा ही नहीं.

पहला कुसुमांजलि सम्मान उषाकिरण खान को देते हुए डा. कर्ण 
सिंह. तस्वीर में बायीं तरफ खड़ी हैं कुसुमांजलि फाउन्डेशन की 
अध्यक्ष डा. कुसुम अंसल 
एपीआई अंसल ग्रुप ने अभी हाल ही में ढाई ढाई लाख रूपये के दो सालाना पुरस्कार ‘कुसुमांजली सम्मान’ नाम से शुरू किये हैं. लेकिन अभी जैसा कि आपने कहा कि हिंदी किताबें खरीदने के लिए भी आसानी से मिलती नहीं हैं, और आप एपीआई अंसल ग्रुप की डाइरेक्टर भी हैं, तो आपने पुरस्कार शुरू करने के बदले इस अभाव की पूर्ति की दिशा में कोई ठोस पहलकदमी क्यों नहीं की? क्योंकि हिंदी और भारतीय भाषाओं के लेखन के लिए पुरस्कार तो कई कई हैं, लेकिन हिंदीपट्टी में लेखकों और पाठकों के हित में अगर कुछ नहीं है तो वह है पुस्तक का बिक्री तंत्र.   
बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप. यह मेरा निजी अनुभव भी है कि किताबें मिलती नहीं हैं, लेकिन इसके लिए पूरा मार्केटिंग प्लान तो मैं नहीं कर सकती. हाँ, मुझे जो बात सबसे ज्यादा अखरती थी, वह यह कि और लेखकों से कैसे मिलूं, यहाँ कोई जगह तो है नहीं दिल्ली में. न पहले थी, न अब है. थोड़ा सा माहौल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में है, लेकिन वहां आपको लोगों को इनवाईट करना पड़ता है. ऐसे में मुझे लगता था कि साहित्य अकादमी वालों को चाहिए कि अपने कैम्पस में कॉफी शॉप बना दें. वहाँ पर जाकर हम मिल बैठ सकते हैं, बात कर सकते हैं. यह आतीजाती जगह पर है तो एक अच्छा साहित्यिक अड्डा बन सकता है. लेकिन खैर, मैंने अपनी एक दोस्त सरोज वशिष्ठ के साथ मिलकर एक छोटा प्रयास यह शुरू किया कि किसी किसी के घर कुछ लेखक जुट गए, कोई कहानी पढ़ रहा है, कोई कविता पढ़ रहा है. 1994 से यह हमने शुरू किया ‘संवाद’ नाम से. अभी यह अंसल भवन में ही मासिक तौर पर हो रहा है.


वैसे हाल के वर्षों में साहित्यिक सरगर्मियां तो बढ़ी हैं. कई तरह के आयोजन शुरू हुए हैं, जिनमें आम आदमी की भागीदारी बढ़ी है. इससे हिंदी लेखन को भी तो फायदा होगा ही?
आजकल लिटरेरी फेस्टिवल को जिस तरह हाईलाईट किया जा रहा है, सब जगह तो विदेशी साहित्य की बात होती है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जितने भी लोग आते हैं, उनमें से आधे लोगों को तो लिटरेचर का ‘एल’ भी नहीं आता. वो सब तमाशबीन होते हैं, फैशनपरस्त लोग होते हैं. जो गंभीर श्रोता होते हैं, उनको तो जगह ही नहीं मिलती बैठने की. मैं गई थी वहां, देखा है. लेकिन हिंदी के सेशन कहाँ होते हैं वहां, कुछ लेखक घूमते दिखाई दे जाते हैं. मैंने एक बात गौर की वहां. अंग्रेजी लेखकों के अपने लिटरेरी एजेंट थे. इनकी ड्यूटी ये होती है कि ये अपने लेखक की किताब को अच्छे से अच्छे पब्लिशिंग हाउस से छपवाते हैं. लेखक और उसकी किताबों की पब्लिसिटी का पूरा इंतजाम देखते हैं. किताब की बिक्री से लेकर लेखक के हर फायदे की देखभाल करते हैं, ऐसा हिंदी में नहीं है. अंग्रेजी लेखकों को जिस तरह से प्रचार प्रसार मिलता है, हिंदी के लेखकों को कहाँ मिलता है? हिंदी के प्रकाशक तो कुछ नहीं करते हैं लेखकों के लिए. वे किताबें छापते हैं, कितनी प्रतियां छापते हैं, लेखक को यह भी नहीं पता रहता. लेखकों से पूछकर देख कर देख लीजिए. किताब कितनी बिकी, यह भी नहीं मालूम चलता. बस, 2000-1500 रुपये का चेक आ जाता है ऐसे ही साल में. जो लिखने के सहारे जीवनयापन करना चाहते हैं, वो नहीं कर सकते. पूरा माहौल कैसा है, सभी जानते हैं. मैं अंग्रेजी में भी लिखती हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी का पलड़ा अभी भी बहुत भारी है. इसमें इतना समृद्ध साहित्य है, जिसको हमारी नई पीढ़ी नहीं जान पाएगी. वह जिस चकाचौंध में फंस रही है, उसमें स्वप्न, निजता, रुमानियत सब लुप्त हो रहे हैं धीरे धीरे. मेरी दिलचस्पी इसमें है कि साहित्य को, खास तौर पर हिंदी साहित्य को पढ़ा जाए.

‘कुसुमांजलि साहित्य सम्मान’ शुरू करने का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
हिंदी लेखकों के लिए कोई पुरस्कार तो है नहीं खास. जो हैं, उनकी अपनी पॉलिटिक्स है. मुझे लगा कि मैं कोई ऐसा पुरस्कार शुरू करूँ जिसमें लेखक का सही मूल्यांकन हो.

साहित्य अकादमी और हिंदी अकादमियां हर साल पुरस्कार देती तो हैं हिंदी लेखकों को?
पता नहीं किसको मिलते हैं ये पुरस्कार.

लेखन की दुनिया में स्थापित होने के लिए स्त्री या पुरुष होने से क्या कोई फर्क पड़ता है? क्या स्त्री को संघर्ष ज्यादा करना पड़ता है?
नहीं. संघर्ष तो पुरुष को भी करना पड़ता होगा. क्योंकि उनको अपने परिवार को पालने के लिए धन अर्जित करने का एक सहारा भी तो चाहिए, उसके लिए वे जो काम करते हैं, उस काम से बचे समय में ही तो वे लिखते हैं. संघर्ष हम महिलाओं को भी करना पड़ता है. घर का काम भी देखो, बच्चों को भी देखो. उसके बाद लिखो. इसके लिए खुद में संतुलन बनाना पड़ता है, अपने आप को व्यवस्थित करना पड़ता है. जैसे मेरी जिंदगी है, अपने लिए तय कर रखा है कि इतने समय में मुझे लिखना है और लिखती हूँ. अगर नहीं लिख सकती तो कोई बात नहीं. मगर मैं अपने घर, अपने पति को नेगलेक्ट नहीं करुँगी.

यानी परिवार को अच्छी तरह चलाते सँभालते हुए भी कोई महिला लेखन कर सकती है?
हाँ, वह मेरी पहली ड्यूटी है. हर महिला की पहली ड्यूटी है. अगर हमने शादी की है, पति और बच्चे हैं तो पहला फर्ज यही है कि हम उनकी देखभाल करें. उसके बाद अपना शौक पूरा करें.

पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच आपके लिए लिखने का सबसे सही वक्त कौन सा होता है?
सुबह जल्दी उठती हूँ, रात को देर से सोती हूँ या रात को उठ कर लिखती हूँ.

आप जब कोई कहानी या उपन्यास लिखने बैठती हैं, एक योजना के साथ बैठती हैं. लेकिन रचना को समाप्त करने के बाद क्या आपको यह संतुष्टि मिलती है कि जैसा आपने सोचा था, पूरा हुआ? अपने लिखे को एक बार में पूर्ण मान लेती हैं या कई बार लिख कर भी पूर्ण नहीं मानती?
जब आप लिखने लगते हैं तो आप कहानी के प्रवाह में बहते चले जाते हैं, तब पता नहीं चलता. जहाँ पर लगता है कि अब बात मुक्कमल होगी, वहां पर रुक जाते हैं. और जहाँ लगता है कि अभी बात नहीं बन रही तो उसको वही छोड़ देते हैं. उसे दो तीन दिन बाद फिर लिखते हैं. अब यह पढ़ने वाले के ऊपर भी है कि मैंने रचना को जहाँ छोड़ा है, वहां उसे वह पूरी लगती है या नहीं. मैं जो कहना चाहती हूँ वह बात उसके मन तक जाती है या नहीं.

क्या लिखते समय पाठक आपके दिमाग में रहता है?
मैं प्रयास करती हूँ कि मैं जो कहना चाहती हूँ वो पाठक तक पहुँच जाये यानी संप्रेषित हो सके. तो इसके लिए मैं वैसे ही शब्द चुनती हूँ, जैसे चरित्र चुनती हूँ, जैसी कहानियां गढ़ती हूँ. अगर पाठक को मेरी बात वैसी ही लगी, जैसी मैंने कहनी चाही थी तो यह मेरी सफलता है. 
 
दो व्यक्तियों के बीच के संबंध की दूरी आपकी कई कहानियों का विषय है. मन के जो भी दुःख हैं, उन दुखों के रंगों की अलग अलग छाया आपकी कहानियों में अलग अलग तरह से उभरी है. इन्हें आपने अपने आस पास के जीवित चरित्रों से लिया है या सोच सोच कर गढा है?   
बहुत सारे कैरेक्टर रियल हैं जो मेरी कहानियों में हैं. कहानियां आखिर होती किसकी हैं, इंसान की होती हैं. इंसान हमारे आसपास हैं. ऐसे कुछ लोग होते हैं जो बहुत प्रभावित करते हैं या उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा खास होता है जो कि आपको प्रभावित करता है. जब आप कहानी में वैसे चरित्र को पिरोते हैं तब वे कैरेक्टर कहीं न कहीं आते ही हैं. कई बार जो लोग उनको जानते हैं वे समझ जाते हैं. जैसे मेरी एक कहानी है ‘पानी का रंग’, उसमें जो रोजी है, वह एक रियल कैरेक्टर है, वह बिलकुल वैसी है, जैसा मैंने लिखा है. मैं उससे कभी नहीं कहती कि यह तेरी कहानी है, वो मुझसे कभी नहीं कहती कि तुमने मेरी कहानी क्यों लिख दी. एक तो वो इतनी बड़ी आर्टिस्ट है, सित्जोफ्रेनिक भी है, जैसा कि लिखा है, वो जरुरतवश लोगों के पर्स से पैसे चुरा लेती है, उसके घर वाले उसकी परवाह नहीं करते. वह बहुत बड़े घर की लड़की है और उसने घर से भाग कर एक मामूली आदमी से लव मैरिज कर ली, वह पति उसे मारता था तो आखिर कैसी लव मैरिज थी वह?  जब उसके बच्चे का ऑपरेशन हुआ, तब उसके साथ कोई खड़ा नहीं था मेरे अलावा. अस्पताल में बिल चुकाने के पैसे नहीं थे उसके पास, मैंने दिए. यह अपनी तारीफ के लिए नहीं कह रही हूँ, कहानी और वास्तविकता पर बात हो रही है, इसलिए कह रही हूँ. उसकी बहन वाकई उसका सामान हड़पती जा रही थी. सब कुछ सच है, पर वो कहानी बनी भी अच्छी है.

मनोविज्ञान की पढ़ाई की वजह से आपको कहानियां बुनने में बहुत मदद मिल जाती होगी?
हाँ, मेरा मनोविज्ञान का अध्ययन मदद करता है मेरी. 
  
आपकी एक कहानी है ‘आते समय’. इसमें पूजा कहती है, जैसे तुमने बहुत कुछ देकर संसार की सभी खुशियाँ दे दी हैं मुझे– पत्थरों से प्रेम करते हो, पत्थरों को तुमसे प्रेम है. दीवारों पर कितने रंग चिपकाए तुमने, टाइलों, सिरेमिक्स, कांच के टुकड़ों के विभिन्न रंगों के बीच बस फंसे हो, जीवन का सुख दुःख तुम्हें कहाँ याद रहता है? यह पूजा नामक किरदार असल में कौन है?
(हँसते हुए) ये मेरे अपने जीवन की कुछ घटनाएं हैं. यह भी बिलकुल सच है. पूरा का पूरा ऐसा हुआ मेरे साथ. उस समय हमलोग बग़दाद में थे. जब ‘वो’ (पति श्री सुशील अंसल) वहां गए तो मैंने भी साथ चलने की बात की. उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ मत आओ. अभी वहां कुछ भी व्यवस्थित नहीं है. रहने की ठीक से जगह नहीं है. तुम वेजिटेरियन हो, तुम्हें खाने की भी दिक्कतें होंगी. मैं जिद्द करके चली गई. उनकी आदत है, सुबह से लेकर रात तक काम करने की. ये अपने काम पर चले जाते, यह कह कर कि अपना ख्याल खुद रखना. यह लगभग २० साल पहले की बात है. उनके जाने के बाद मैं तैयार होकर होटल के काउंटर पर गई. रिसेप्शनिस्ट से गाइड वगैरह के बारे में पूछा. उसने कहा कि हमारे पास ऐसा कोई इंतजाम नहीं है. मैंने पूछा कि फिर मैं शहर देखने कैसे जाऊं? भाषा की भी समस्या थी. वहां अंग्रेजी समझने वाले भी कम ही थे. उसने कहा कि हम आपके लिए एक टैक्सी का इंतजाम कर देते हैं, साथ में एक ऐसा आदमी दे दे रहे हैं जो अंग्रेजी बोल सकता है. मैंने बड़ी हिम्मत की और बिना सोचे समझे उसके साथ चल पड़ी. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ क्या है? भाषा की बड़ी समस्या थी. ड्राइवर अंग्रेजी बोल सकता था, यह राहत थी. लेकिन वह गाइड तो था नहीं. खैर, उसने एक मस्जिद के सामने गाड़ी रोकी. मस्जिद ही हैं वहां पर ज्यादा. मुश्किल यह हुई कि मैं मस्जिद के अंदर जाना चाहूं और गेटवाला मुझे अंदर जाने न दें. जब ड्राइवर गाड़ी पार्क करके आया तो उसने उससे बात की. फिर मुझसे कहा कि मैडम, आप बुरका पहन लीजिए. तब यह नहीं रोकेगा. मैं बुरका पहन कर अंदर होकर आई. वहां वह भी है, ‘हैंगिंग गार्डन ऑफ बेबीलोन’. वहां तो कुछ खास था ही नहीं, बड़ी निराश हुई मैं. खैर, यह कहानी उसी समय के सुखदुख को लेकर बुनी गई है. 
   
एक रचनाकार क्या अपनी रचना में गैर ईमानदार हो सकता है?
तो मैं आपको एक बात बता दूँ, अपनी जिंदगी में भी मैं ईमानदारी निभाती हूँ और लिखने में भी. मैंने अपनी आत्मकथा लिखी हुई है. जब सुशील जी की जीवनी ‘ब्रिक बाई ब्रिक’ अशोक मल्लिक लिख रहे थे, तो उनको मैंने अपनी आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया’ पढ़ने के लिए दी, साथ में फादर-इन-ला की जीवनी भी उनको दी. मैंने कहा कि पहले इन दोनों को पढ़ो, फिर लिखना शुरू करना. मेरी आत्मकथा पढ़कर उसने मुझसे पहला वाक्य कहा, यू आर सो फ्रैंक...आज भी मैं अपनी आत्मकथा पढ़ती हूँ तो मुझे लगता है कि वो मुझे नहीं लिखना चाहिए था. उस समय की मेरी मानसिकता वैसी रही होगी कि वैसा लिखा.

क्या आप डायरी भी लिखती हैं?
डायरी तो बहुत पर्सनल चीज होती है. बचपन में मैं लिखती थी, बाद में नहीं लिखा. हाँ, क्या करना है, क्या नहीं करना है, इसकी डायरी जरुर मेंटेन की. लेकिन यह अलग चीज है.

आपने बताया कि स्टार पब्लिकेशन से जब आपके शुरूआती उपन्यास छपे, तब आपको मालूम नहीं था कि वहां से छापने के कारण वो साहित्यिक नहीं माने जाएंगे. आखिर लोकप्रिय और साहित्यिक लेखन का फर्क आपके दिमाग में कैसे आया? आपने किस आधार पर चुना कि आपको लोकप्रिय लेखन नहीं करना है?  
देखिये, मैंने लेखन में किसी तरह का समझौता नहीं किया. मेरे मन जो आया, वही लिखा. लोकप्रियता की बात कभी मेरे मन में नहीं आई. जब मैं अपनी पहली पुस्तक स्टार पब्लिकेशन के अमरनाथ जी को देने गई तो उन्होंने उसे लेते हुए कहा कि हम गुलशन नंदा को बहुत छापते हैं. उस वक्त भी मेरे दिमाग में यह बात थी कि गुलशन नंदा साहित्यिक लेखक नहीं हैं. यह क्यों थी, कैसे थी, नहीं मालूम. वो किताब को लेकर अपने बेचने के बारे में सोच रहे थे, मैं अपने लिखने के स्तर के बारे में सोच रही थी.  और उसी वक्त यह सोच लिया था कि मुझे लोकप्रिय लेखक नहीं बनना है. जो मैं चाहती हूँ, वहीं लिखूंगी. अपने स्तर को और ऊपर ले जाउंगी. वैसे यह किसी भी लेखक की मर्जी है कि वह कैसा बनना चाहता है.

अब देखिये कि आपको शिवानी बहुत पसंद हैं, और हिंदी के आलोचक तो उनको साहित्यिक मानते ही नहीं. जो ज्यादा बिकता है, उसके साहित्यिक होने पर वैसे भी संदेह किया जाता है हिंदी साहित्य की दुनिया में. धर्मवीर भारती तक इसकी चपेट में हैं. क्या कहेंगी आप?
पाठक भी तो कई तरह के होते हैं न. पाठक तो अपने टेस्ट के हिसाब से पढता है. सब तरह के लेखक हैं और सब तरह के पढ़ने वाले भी. लिखने वाले की अपनी रूचि होती है तो पढ़ने वाले की भी.

आजकल हर क्षेत्र के आइकॉन हैं. हर माँ-बाप अपने बच्चे बच्चियों को वैसा बनाना चाहते हैं. कोई अपनी संतान को लेखक बनाना चाहता है, यह सुनने में नहीं आता. फिर भी ऐसे कुछ नौजवान होंगे जो अपने लेखन के बारे में आपकी राय जानना चाहते होंगे?
बहुत सी लड़कियां आती हैं मेरे पास. कुछ लोगों का लिखा मैं पढ़ती भी हूँ और उनका उत्साह बढाती हूँ. सलाह मशविरा भी देती हूँ कि कैसे लिखो, कैसे छपवाओ. हमारे आयोजन ‘संवाद’ में भी ऐसे बहुत लोग आते हैं. जिसकी रचना में थोड़ा भी दम है, वह आगे तो जायेगा ही. हाँ, आजकल आइकोन तो हैं ही बहुत.  टीवी पर बरखा दत्त है, उसको देख कर बहुत सी लड़कियां जर्नलिज्म करना चाहती हैं. लेखकों में शायद अमृता प्रीतम प्रेरणा देती होंगी या शोभा डे देती होंगी. हिंदी की लेखिकाओं को तो इतनी चमकदमक मिलती नहीं न? वैसे ये जो शोभा डे हैं, क्या लेखन है उनका? उनकी वो कौन सी शैली है, जिसकी वजह से वो सबसे बड़ी लेखिका मानी जाती हैं? पता नहीं. फिर भी ऐसे लोग अट्रैक्ट तो करते ही हैं नई पीढ़ी को. उनको लगता है कि हम भी ऐसा ही बनें. जैसे हमको अपने ज़माने में महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम बहुत अच्छी लगती थीं. कुछ लेखन ऐसे होते हैं कि आपके अंदर चले जाते हैं. और आप जिसका लिखा ज्यादा पढ़ते हैं, वैसा ही लिखने का आपका भी मन करता है.  

02 January, 2013

डांस ने बदल दिए मेरे दिन: वहीदा रहमान


हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत और प्रतिभासंपन्न अभिनेत्रियों में वहीदा रहमान वह नाम हैं, जिनको कुछ लोग उनके नृत्य की वजह से बार बार याद करना पसंद करते हैं तो कुछ लोग उनके भावपूर्ण जीवंत अभिनय के लिए. लेकिन सभी उनकी जिस एक विशेषता को समान रूप से रेखांकित करते हैं, वह है उनके सौंदर्य और व्यक्तित्व की शालीनता. सफल फ़िल्मी कैरियर और सफल वैवाहिक जीवन जीने की हुनरमंद 76 वर्षीय वहीदा जी ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सौ साल के इतिहास में से लगभग आधे दौर को जिया है.  जुलाई  2012 में  'हैबिटैट फिल्म फेस्टिवल’ में  इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा उनकी फिल्मों के पुनरावलोकन का विशेष आयोजन  किया गया. उसी मौके से उनसे  'सरिता' पत्रिका के लिए  हुई  मेरी खास बातचीत  का  यह अंश:


फोटो सौजन्य: दिल्ली प्रेस
बचपन की कुछ वैसी यादों के बारे में बताएं, जिन्हें दुहरा कर आपको खुशी मिलती हो.
(सवाल सुनते ही चेहरे पर एक मीठी मुस्कान पसर जाती है) मेरा बचपन बहुत खूबसूरत था. हम चार बहने थीं. पिता डिस्ट्रिक्ट कमिशनर थे. हम पिकनिक मनाने बहुत जाते थे. कभी कहीं, कभी कहीं. परिवार के सभी लोग होते. पिताजी के अधिकारी मित्र भी अपने अपने परिवार के साथ होते. बड़े लोग मिलजुल कर खाना पकाते थे, गप्पे मारते थे, और हम बच्चों का काम होता था पत्थर चुन कर लाने का. ये पत्थर चूल्हा बनाने के काम आते थे वहाँ. हम लोग खूब खेलते, बहुत मजा आता. मेरा बचपन बहुत खुशहाल था. पिता का तबादला हर ढाई तीन साल में अलग अलग जगह होता रहता था. इसलिए मैं भाषाएँ भी कई सीख गई, थोड़ा बहुत बोलने लायक. तेलुगु और तमिल तो अच्छी तरह सीख गई थी.

आपका परिवार एक पारंपरिक कुलीन मुस्लिम परिवार था, भरतनाट्यम सीखना कैसे शुरू हुआ?
मैं बचपन में बीमार बहुत रहती थी. इस का असर पढ़ाई पर बहुत पड़ता था. कभी परीक्षा के समय ही बीमार हो गई, सेमेस्टर डिस्टर्ब हो गया. घर में हूँ तो क्या करूँ. तो ऐसे में परिवार में बात हुई कि डांस सीख लूँ. पिता जी ने भरतनाट्यम को चुना और मैने सीखना शुरू कर दिया.

आपने बचपन में डॉक्टर बनने का ख्वाब देखा था, उसे अधूरा छोड़ने की क्या वजह हो गई?  
उस समय डॉक्टरी का पेशा लड़कियों के लिए इज्जत का पेशा माना जाता था. वैसे और कुछ के बारे में मुझे मालूम भी कहाँ था? पिता अधिकारी थे तो उसी तरह की सोसायटी के परिवारों में आना जाना था. जब किसी के यहाँ गए तो मर्द मर्दों में और औरतें औरतों की जमात में बात करने बैठ जाते थे. बच्चों को कह दिया जाता कि तुमलोग अलग जाकर खेलो. हम बड़ों की बातें तो कभी सुन नहीं पाते कि दुनिया के बारे में कुछ ज्यादा जान सकते. मैं केवल डॉक्टरी पेशे के बारे में जानती थी और सोच लिया था कि वही बनूँगी. लेकिन जैसा कि बताया, बीमार बहुत रहती थी, इसलिए पढ़ाई पर असर पड़ता था. इसी वजह से शायद गंभीर इरादा बना नहीं, बस सोचा भर था. फिर तो डांस में मन रम गया. स्कूल में और बाहर भी स्टेज पर परफॉर्म किया. डांस की वजह से ही फिल्मों में काम करने का ऑफर आ गया.

तब शरीफ घरों की लड़कियों का फिल्मों में जाना कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती थी. आपके पिता उच्च अधिकारी भी थे, ऐसे में आपके घर में फिल्मों और फ़िल्मी कलाकारों के बारे में किस तरह की राय थी?
मेरे पिता फिल्मों के बहुत शौक़ीन थे. चाहे जिस शहर में रहे, वहाँ पूरा परिवार फिल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल गया. सिनेमा हॉल के मालिक भी कमिशनर साहब को नई फिल्म आने पर देखने के लिए बुलाते. उनके साथ देखी फिल्मों में बरसात, दास्तान वगैरह याद हैं. अशोक कुमार और लीला चिटनिस जैसे कलाकार उनको बहुत पसंद थे. इसलिए घर में फिल्मों को लेकर अच्छा नजरिया ही था. मेरे फिल्मों में आने से पहले पिता का इंतकाल हो गया था, तब मैं 13 साल की रही होउंगी.

फोटो सौजन्य: दिल्ली प्रेस 
फिल्मों में आपका कैसे आना हुआ?
फिल्मों में मैं डांस की वजह से आई. डांस ने ही मेरे दिन बदल दिए. तेलुगु फिल्म ‘रोजुलू मराई’ में एक डांस करने का मौका मिला. वह फिल्म 1955 में रिलीज हुई. उसी साल फिल्म सिटी में उसकी सिल्वर जुबली सफलता की सेलिब्रेशन पार्टी थी. उसमें हीरो हिरोइन सब आये थे. लेकिन पब्लिक ने हल्ला शुरू किया कि वो लड़की कहाँ है, जिसने डांस किया है. हमें उसको देखना है. फिर तो लोगों को शांत करने के लिए तुरत मेरे घर गाड़ी भेज कर मुझे बुलवाया गया. जब मैं वहाँ पहुंची तो पब्लिक ने मुझे देखने के लिए मेरी गाड़ी को घेर लिया. उस दौरान गुरुदत्त जी वहाँ अपनी फिल्म के सिलसले में किसी मीटिंग के लिए गए थे. जब उन्होंने बाहर हो-हल्ला सुना तो पूछा कि क्या बात है. उनको किसी ने सारा हाल बताया. गुरुदत्त जी ने कहा कि तब तो उस लड़की को हमें भी देखना चाहिए. और उसी के चार महीने बाद उनके दफ्तर से मेरी माँ के पास चिट्ठी आई कि वहीदा को फिल्म में अभिनय के लिए मुम्बई लेकर आयें. मुझे ‘सी.आई.डी. फिल्म के लिए वैम्प का एक रोल ऑफर हुआ था. यह फिल्म 1957 में आई. फिर ‘प्यासा’ में लीडिंग रोल मिला. उसके बाद तो सिलसिला शुरू हो गया फिल्में मिलने का.  

अपनी पहली ही फिल्म में वैम्प का रोल करना क्या आपको अपने कैरियर के लिए खतरनाक नहीं लगा?
उस वक्त मुझे फ़िल्मी दुनिया के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, जो काम मिला, किया. गाइड करने के समय कुछ लोगों ने जरुर आगाह किया कि रोज़ी जैसी लड़की का कैरेक्टर निभाने जा रही हो, जो अपने पति को छोड़ कर एक दूसरे लड़के के साथ रहने चली जाती है, दर्शक पसंद नहीं करेंगे. तुम्हारे आगे के कैरियर पर भीं असर पड़ेगा. लेकिन मैने किया, क्योंकि मुझे वह रोल अच्छा लगा, चैलेंजिंग लगा.

बुनियादी तौर पर एक डांसर होने का एक अभिनेत्री के रूप में आपको क्या फायदे मिले?
देखिये, उस जमाने में अभिनय का कोई कोर्स तो होता नहीं था, काम करते करते ही सब कुछ सीखते थे.
मैं जब फिल्मों में काम करने आई तो मैं पहले से एक डांसर होने की वजह से भाव और रस वगैरह तो जानती थी. क्योंकि नृत्य में तो भाव का बड़ा महत्व है. इसलिए मुझे अभिनय करते समय फेसियल एक्सप्रेशन देने में कोई खास दिक्कत नहीं होती थी, तो लाभ तो मिला ही. 

जब आप फिल्मों में नई नई आई थीं, तब आपको नींद बहुत प्यारी थी. किस तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ा आपको नींद की वजह से?
हाँ, तब मुझे जल्दी सोने की आदत थी. कोलकाता में ‘प्यासा’ के एक गाने ‘जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैने सुनी’ को देर रात में फिल्माया जा रहा था. मैं अपनी कुर्सी में ही सो गई थी. जब शॉट रेडी हो गया तब मेरे चेहरे पर पानी छिड़क कर मुझे जगाना पड़ा. गुरुदत्त ने कहा कि चाय पी लो, ताकि नींद खुल जाए. लेकिन तब मैं चाय नहीं पीती थी. खैर, वो गाना बड़े खूबसूरत ढंग से फिल्माया गया. लोगों ने उसमें मुझे बहुत पसंद भी किया, लेकिन मैं आज भी उस गाने को देख कर सोचती हूँ कि कैसे मैं गहरी नींद से उठ कर ऐसा अभिनय कर पाई.

क्या अब भी चाय नहीं पीतीं?
अब तो पीती हूँ, लेकिन दो से तीन बार. इस से ज्यादा नहीं.

‘प्यासा’ में ही एक गीत है ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’, वह आप पर फिल्माए गए सभी गानों में सबसे सेंसुअस जान पड़ता है. उसमें चेहरे पर, आँखों में जिस तरह से कामना दिखाई पड़ती है, वह बहुत प्रभावी है. क्या आप भी ऐसा मानती हैं?
(थोड़ा शरमाते हुए) हां, है तो, भाव के स्तर पर.

गुरुदत्त और आपका संबंध शुरू से बहुचर्चित रहा है. हालाँकि आपने उन्हें अपना मेंटर ही माना है और उनके लिए हमेशा आदर प्रकट किया है, बावजूद इसके अभी भी लोग लिखते और कहते हैं कि गुरुदत्त आपसे इकतरफा प्यार करते थे. क्या वाकई ऐसा था, क्या उन्होंने कभी आप पर यह जाहिर होने दिया था?
देखिये, यह तो मीडिया वाले लोगों की बनाई हुई कहानी है. न कुछ जानते हैं, न समझने की कोशिश करते हैं, जरा सी बात का बतंगड बना देते हैं. गुरुदत्त ने मुझे फिल्मों में काम करने का मौका दिया, उनके साथ मेरी लगातार फिल्में आईं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि हमारे बीच कुछ था ही. उन्होंने तो मुझे कभी नहीं रोका कि किसी और के साथ काम मत करो. जब मैं उनके साथ काम कर रही थी, तभी देवानंद के साथ भी काम कर रही थी. मैने तो सबसे ज्यादा फिल्में देव के साथ की हैं, लेकिन गुरुदत्त के साथ नाम जोड़ दिया गया, कहानी बना दी गई.

फोटो सौजन्य: दिल्ली प्रेस 
लोग गुरुदत्त की आख़री वक्त की निराश मानसिकता को उनकी प्रेम की असफलता से जोड़ कर देखते हैं.
लोग नहीं, पत्रकार. देखिये, मैने गुरुदत्त साहब के साथ आख़री फिल्म की थी ‘साहब, बीबी और गुलाम’ 1962 में, उसके बाद उनके साथ कोई फिल्म नहीं की. दुर्घटना हुई 1964 में. अगर उनकी निराशा में मुझसे संबंध का कोई असर था तो वह 2 साल बाद क्यों हुआ, तभी क्यों नहीं हुआ?

क्या यह सही नहीं है कि तब हीरो हिरोइन आपसी लगाव का इजहार करने से बचते थे. आज तो हीरो से पहले हीरोइनें ही संबंध बनने और बिगड़ने की सार्वजनिक घोषणा तक कर देती हैं.
तब समय अलग था, अब अलग है. आज हीरो हिरोइन फिल्म के प्रोमोशन के लिए कहीं जाते हैं, हाथ से हाथ छू गया, जरा हंस कर बात कर लिया तो बात शुरू हो जाती है कि इनके बीच कुछ है. हमारे समय में तो हाथ छूने का सवाल ही नहीं उठता था. एक दूसरे की तरफ जरा नजर भर देख क्या लिया कि कहानियां बननी शुरू हो जाती थीं. मेरी बेटी के स्कूल में उसका फेयरवेल था. मैं उसको लेने गई तो सब लड़के लडकियां एक दूसरे से गले मिलकर विदाई ले दे रहे थे. मैं तो हैरान रह गई. बेटी से पूछा कि यह क्या है. उसने कहा कि माँ अब जमाना बदल गया है. हम लोग ऐसे ही रहते हैं. यह आपका समय नहीं है. वाकई हम तो ऐसा सोच भी नहीं सकते थे. आज माधुरी अपने शो में अगर किसी से गले मिलती है तो इसमें बुरा क्या है. हमें तो बहुत बचबचा कर रहना होता था.

अपने समय में जिन अभिनेताओं के साथ काम किया, उनमें किसका व्यक्तित्व आपको बहुत पसंद आया?
देवानंद, गुरुदत्त, राजकपूर, दिलीप कुमार, सुनील दत्त, राजेश खन्ना, राजेंद्र कुमार, अमिताभ बच्चन सबके साथ काम किया. सब अच्छे लोग थे. अमिताभ के साथ जब काम किया तब से अब तक एक जैसा संबंध है. अमिताभ अभी भी वैसा ही व्यवहार करते हैं. वो बहुत आदर देते हैं. एक बार की बात है, मैं एक समारोह से निकली. वो भी वहाँ से निकल रहे थे. लोग उनके पीछे पड़े थे, लेकिन वो मेरे साथ चले आ रहे थे. मैने कहा, आप जाइए. आप लोगों से घिर जाएंगे. बोले, नहीं. आपको गाड़ी में बिठाकर आऊंगा. लोगों का क्या है. और वे मुझे गाड़ी में बिठाकर ही लौटे. वो बहुत शालीन हैं, आज कामयाबी के जिस मुकाम पर हैं, उससे भी आगे जायें, मैं तो यही चाहूंगी.

फोटो सौजन्य: दिल्ली प्रेस 
अपने साथ और बाद की अभिनेत्रियों में किसे सुन्दर मानती हैं?
मीना कुमारी. उनका अपीयरेंस परदे पर हो या परदे से बाहर, बहुत गंभीरता और गरिमा होती थी. मधुबाला मुझे पसंद थीं. वैजयंतीमाला भी. आशा पारेख, माला सिन्हा, नरगिस, माधुरी भी. ऐश्वर्या राय आज की अभिनेत्रियों में बहुत सुन्दर है. विद्या बालन को मैं बहुत पसंद करती हूँ, वो जैसे रोल चुनती है, जिस तरह का अभिनय है उसका, सब पसंद है मुझे.
 
अपने अब तक के जीवन को किस तरह देखती हैं?      
मैने जो कुछ किया उसका कोई रिग्रेट नहीं है, किसी से कोई शिकायत नहीं है. इंडस्ट्री में सबके साथ काम कर के बहुत अच्छा लगा. मेरी बहुत शुभकानाएं हैं नए लोगों को. खूब आगे बढ़ें, अच्छा करें.